Tuesday, March 18, 2008

क्या आपको कोई समस्या है? कोई भी समस्या, कैसी भी समस्या. हर समस्या का इलाज मेरे पास है. विश्वास नहीं होता? जरा नीचे दिए गए विज्ञापन पर नज़र डालिए, जो आज के अख़बार के साथ इंसर्शन के रुप में सुबह-सुबह आया है.

अब तो विश्वास हो गया ना. तो फिर, आप भी आमंत्रित हैं. अपनी समस्या को लेकर आइए और हम आपकी समस्या का समाधान, इलाज, रास्ते सब कुछ बताएंगे!

इस विज्ञापन को देखते ही मुझे बीसेक साल पुरानी घटना याद आ गई. तब मैं अम्बिकापुर मीटिंग के सिलसिले में गया था, और एक होटल में रुका हुआ था.

उसी होटल में, जैसा कि इस विज्ञापन में वर्णित है, एक ऐसा ही जादूगर भविष्य वक्ता ठहरा हुआ था, जो तीन सवालों के जवाब सौ रुपए में तब देता था, जब बहुत से सीनियर ऑफ़ीसरों की तनख़्वाह तीन अंकों से ज्यादा नहीं पहुँच पाती थी. उसके पास भी लोग अपनी समस्याओं को लेकर आते जाते रहते थे, और वह तांत्रिक भी इसी तरह अपनी शक्तियों का विज्ञापन अखबारों, पैम्प्लेट और दीवार पर इश्तहारों से करता रहता था.

दिन भर की बोझिल मीटिंग के बाद रात को मैं होटल आया तो करने को कुछ नहीं था, इसीलिए रिसेप्शन पर बासी अख़बारों के पन्ने चाटने लगा था. वहां कई लोग और बैठे थे. बातों बातों में पता चला कि उनमें से कुछ लोग उस तांत्रिक से अपनी समस्या का समाधान लेने आए हैं. और, उनमें से कुछ प्रतिष्ठित, जाने-माने लोग भी थे.

मुझे कौतुहूल हुआ. मैंने इस तांत्रिक की सत्यता परखनी चाही. मैंने भी अपना नाम समस्या का हल चाहने वालों की कतार में दर्ज करा दिया. कोई घंटे भर बाद तांत्रिक का बुलावा मेरे लिए आया.

अंदर बहुत सारी मोटी मोटी पुस्तकें रखी हुई थीं. तांत्रिक ने अपने विज्ञापन में मां काली का महा भक्त होने के साथ साथ जर्मनी से ज्योतिष शास्त्र में पीएच.डी. डिग्री, वह भी स्वर्णपदक प्राप्त होने का हवाला दिया हुआ था. सो जाहिर था कि वह अपने आप को आम पोंगा पंडित कहलवाना पसंद नहीं करता था और पीएच.डी. की डिग्री का मान रखने के लिए ढेरों किताबें भी साथ ले के चलता था. वह व्यक्ति के मस्तिष्क को देखकर भविष्य बताता था, और समस्याओं का शर्तिया हल भी बताता था.

उसने मुझसे कोई तीन प्रश्न पूछने को कहा. बीच-बीच में अंग्रेज़ी में बोलकर वह अपना दबदबा दिखाना चाहता था –

“यू सी आइ एम नॉट एन ऑर्डिनरी पंडित. आइ एम ए लर्नेड फेलो विद होस्ट ऑफ़ डिग्रीज़ बिहाइंड मी. सो यू कैन हैव फुल फैथ अपॉन माइ सॉल्यूशन्स… ”

“वैल, दिस इज़ माइ लवर्स फोटोग्राफ टू हूम आइ वांट टू मैरी…” मैंने अपने पर्स में रखा चित्र उसे दिखाते हुए, अंग्रेज़ी में ही उत्तर दिया ताकि उसका अंग्रेज़ी का दर्प कुछ कम हो. असर प्रत्यक्ष था.

उसने एक उड़ती-उचटती सी निगाह उस चित्र पर डाली और कहा – “नो – नो. यह संभव नहीं होगा. आपकी शादी इस महिला के साथ नहीं हो सकती. आपकी शादी तो आपके पैरेन्ट जहाँ तय करेंगे वहीं होगी, बड़ी अच्छी शादी होगी और अत्यंत सफल शादी होगी. नेक्स्ट क्वेश्चन.”

मुझे झटका सा लगा. मेरा प्यार उस वक्त परवान चढ़ने चला था और कभी कभी वह खाइयों में भी उतरता दीखता था. मुझे लगा कि उस तांत्रिक की बात में दम है, और शायद वह समाज का शाश्वत सत्य ही बयान कर रहा है – बड़ी अच्छी शादी होगी – यानी कि चार-पाँच लाख दहेज के मिलेंगे – गाड़ी, कई तोला सोना, फर्नीचर और पता नहीं क्या-क्या साथ में…

अगले प्रश्न का आदेश आ चुका था तो मैंने अपने कैरियर के बारे में पूछा. उसने अपने सामने रखी कई किताबों में से एक को उठाया और बड़े स्टाइलिश तरीके से बेतरतीबी से पन्ने पलटे. मुझे दिख गया था कि उन पन्नों को पढ़ने का कोई इरादा उसका था नहीं. वह महज़ नाटक कर रहा था. अब इस नाटक में मुझे मजा आने लगा था.

“मिस्टर, आप कुछ ही समय में राजनीति में उतरने वाले हैं. बड़े ही धमाकेदार तरीके से आप राजनीति में उतरेंगे और आप अपने क्षेत्र में अत्यंत सफल होंगे.”

मुझे दूसरा झटका लगा. इस बार का झटका सुनामी जैसा (यह नाम तब नहीं सुना था) था. मैंने उससे बहस करनी चाही कि मुझे तो राजनीति में इंटरेस्ट ही नहीं है, राजनीति से मेरे खानदान के किसी भी व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं है और मैं किसी सूरत नेता तो बनना ही नहीं चाहता – वह भी किसी पॉलिटिकल पार्टी का!

तांत्रिक ने घोषणा की कि वह कोई ऑर्डिनरी पंडित नहीं है, वह बहस नहीं करेगा, उसने मेरा भविष्य बता दिया है, और चूंकि भविष्य में लिखा है – इसलिए इससे बचने का कोई दूसरा उपाय भी नहीं है. चलो – इस बात की सांत्वना थी कि मैं अपने क्षेत्र में अत्यंत सफल तो रहूँगा – भले ही राजनीति को मैं नीम चढ़े करेले की तरह पसंद करता होऊँ. उसने अपनी फ़ीस पुख्ता करने के लिए मुझसे अपना तीसरा प्रश्न पूछने को कहा.

तब तक मैं उस तांत्रिक के प्रभामंडल से बाहर आ चुका था. मैंने अपना तीसरा प्रश्न सीधे उस पर दाग दिया – “मैं आपकी फीस के सौ रुपए आपको दूंगा या नहीं?”

“क्या मतलब?” उसने नाराज होते हुए कहा.

“जी, हाँ, मेरा तीसरा प्रश्न यही है. मैं आपकी फीस के सौ रुपए आपको दूंगा या नहीं?”

जाहिर है, वह उत्तर दे नहीं सकता था. वह फंस चुका था. शायद उसको अहसास हो गया कि किस क़िस्म का ग्राहक आ फंसा है.

“क्या मज़ाक कर रहे हैं आप. जानते नहीं आप किससे बात कर रहे हैं – मैं आपको नष्ट करने की ताक़त रखता हूँ.” तांत्रिक अपना रौद्र रुप दिखा कर भय का वातावरण बनाने की कोशिश कर रहा था.

“आप चाहै जैसी ताक़त रखते हों, पर आप हैं पूरे नक़ली. जो चित्र आपने अभी देखा, जिससे मेरे विवाह नहीं होने की भविष्यवाणी की, वह मेरे दो बच्चों की माँ है. बोलो तो अपने बच्चों के फोटो भी दिखाऊँ?” कहते-कहते झूठमूठ मैंने अपने पर्स में फिर से हाथ डालने का अभिनय किया. मेरा चेहरा आत्मविश्वास से भरा हुआ था – ठीक उसी तरह से, जिस तरह से वह बड़े आत्मविश्वास से मेरे बारे में भविष्यवाणियाँ सुनाए जा रहा था.

तांत्रिक का चेहरा उतर गया. उसे अपने से भी भारी तांत्रिक मिल गया था जो उसे खुले आम उसके झूठ का चैलेंज अपने झूठ से कर रहा था. वह सफाई देने लगा – कोई आदमी परिपूर्ण नहीं हो सकता, ज्योतिष गणनाएँ कभी गलत हो जाती हैं, मुझसे भी गणना में गलती हो गई … इत्यादि इत्यादि…

मैं बगैर पैसे दिए बाहर चला आया. बाद में पता चला कि उस तांत्रिक ने एक सेक्रेटरी रख लिया है और अब वह अपने ग्राहकों से पेशगी पैसा वसूलता है, तब अपने कमरे में आने देता है

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